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संत शिरोमणि रविदास जी ने जीवन का मर्म सिखाया

16 Feb 2022
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आकाश में व्याप्त अंधकार का हरण करने के लिए सूर्य और चंद्र अपनी आभा बिखेरते हैं और समाज में व्याप्त कुरीतियों के तमस का अंत करने के लिए संत रविदासजी महाराज जैसे महापुरुषों का अवतरण होता है। अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने के लिए और जन-पीड़ा की अमावस्या को तिरोहित करने के लिए ही संवत् 1433 की माघी पूर्णिमा को ज्ञान, तप और वैराग्य की शाश्वत भूमि काशी में रविदासजी के रूप में एक ऐसी महान दैवीय शक्ति ने शरीर धारण किया था, जिन्होंने सद्भाव से रहने, सभी प्रकार के भेद का विनाश करने, सबके भले की शिक्षा देने और सामाजिक समरसता के दिव्य नाद का उद्घोष करने का महान कार्य किया। यद्यपि वे सुसंपन्न चर्म-शिल्पी परिवार में अवतरित हुए थे, लेकिन महात्मा कबीर की प्रेरणा से स्वामी रामानंदजी महाराज को अपना गुरु बनाकर, उन्होंने दिव्य आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। 

               ‘संत समागम, हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय‘ के अनुरूप बाल्य-काल से ही रविदासजी साधु-संतों की दुर्लभ संगति का अमृत पान करते रहे थे। संत सेवा के साथ-साथ दीन-दुखियों, गरीबों और असहायों की सेवा में उन्होंने अद्भुत आनंद प्राप्त किया और मधुर व्यवहार तथा समयबद्ध जीवन की अनुशासित प्रवृत्ति के कारण साधु-संतों का आशीर्वाद भी प्राप्त किया। उनका अवतरण ऐसे समय में हुआ था, जब समाज में असमानता की भावना, जाति, पंथ और संप्रदाय की जटिल परिस्थितियाँ थीं, विधर्मियों के आक्रमण का समय था और भारतीय परंपराओं पर लगातार कुठाराघात किया जा रहा था। ऐसे समय में उन्होंने अपने वचनों से विश्व एकता और समरसता पर विशेष बल दिया। उनके मधुर, तत्वपूर्ण, सहज और सरल वचन अध्यात्म की गहराइयों के साथ-साथ जीवन के यथार्थ से जुड़े हुए थे। इसलिए सामान्य नर-नारी और राज परिवारों के अनेक व्यक्ति भी उनके शिष्य बने। यहाँ तक कि सगुण भक्ति की आराधिका मीराबाई ने भी आपको अपना गुरु स्वीकार किया था। यह भी मान्यता है कि जब मीराबाई के पति की मृत्यु हुई तो रविदासजी ने ही मीराबाई को सती होने से रोका था। इससे पता चलता है कि भारत में सती प्रथा बंद करने की परंपरा का प्रारंभ रविदासजी ने ही किया था। इसीलिए मीराबाई ने चितौड़ के कुंभाश्याम मंदिर के प्रांगण में रविदासजी की चरणपादुकाएँ स्थापित करवाई थी।

               रविदासजी के जीवन से संबंधित अनेक चमत्कारिक घटनाएँ जन-मानस में प्रचलित हैं, परन्तु उससे अधिक महत्वपूर्ण, उनका यह विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परोपकार और मधुर व्यवहार अत्यंत आवश्यक है। उनका मत था कि अभिमान से रहित व्यक्ति ही ईश्वर की भक्ति कर सकता है। उनकी वाणी भक्ति की सच्ची भावना के साथ-साथ समाज के व्यापक हित और मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम के संदेशों से युक्त होती थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जन्म और व्यवसाय के आधार पर कोई महान नहीं होता, अपितु श्रेष्ठ विचार, समान हित और सदाचार के गुण ही मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं।

 

              

               रविदासजी ने अपनी आत्मा की आवाज को कभी भी धन या प्रसिद्धि का दास नहीं बनने दिया। उन्होंने पुरुषार्थ के स्थान पर कभी भी अकर्मण्यता को स्वीकार नहीं किया। इस दृष्टि से वे देश की आध्यात्मिक परंपरा को ही आगे बढ़ा रहे थे। मन की पवित्रता उनके लिए मानव जीवन का सच्चा जीवन लक्ष्य थी, इसलिए ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा" जैसे सुविचार उन्होंने क्रियान्वित करके भी दिखाए। वे महान संत ही नहीं थे, अपितु महान समाज सुधारक, साधक और कवि भी थे। उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में छुआछूत, ऊँच-नीच और जातिवाद जैसी कुरीतियों का प्रतिकार किया और आजीवन उनके विरुद्ध सक्रिय रहे।

               उन्होंने समस्त मानव समाज को मानवता और कर्मत्व की शिक्षा दी। वे चर्म-शिल्पी थे, परन्तु जीवन का मर्म जानते थे और इस मर्म ज्ञान के माध्यम से ही उन्होंने समाज को जागृत करने तथा नई दिशा देने का प्रयास किया। रविदासजी की वाणी सारगर्भित, अनूठी और प्रभावशाली थी। श्री गुरु ग्रंथ साहब में उनकी वाणी विभिन्न स्थानों पर उल्लेखित है। रविदासजी के शब्द भंडार में पंजाबी, अरबी, फारसी, राजस्थानी, हिन्दी भाषा के साथ-साथ भोजपुरी और ब्रज भाषा के शब्दों का भी दर्शन होता है। उनका चिंतन, इतना निर्भीक था कि उन्होंने पराधीन शासन काल में भी भय रहित होकर, पराधीनता के विरुद्ध आवाज उठायी थी। उन्होंने कहा था कि-

पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत।

रविदासदास पराधीन सों, कौन करे है प्रीत।।

               अर्थात् पराधीनता पाप है और गुलाम व्यक्ति से कोई प्रेम नहीं करता। सिंह के समान गर्जना करते हुए उन्होंने स्वराज्य के महत्व को भी प्रतिपादित किया था और कहा था कि-

रविदास मानुष करि बसन कूं, सु कर है दुई ठांव

इक सु है स्वराज महिं दूसर मरघट गांव।।

               अर्थात् मनुष्य के सुख और शांतिपूर्वक जीने के लिए दो ही स्थान निर्धारित हैं, एक है स्वराज्य और दूसरा है श्मशान। उनका मत था कि किसी की भी पराधीनता स्वीकार करना मृत्यु के समान है। 

               भूख, भय और भ्रष्टाचार से रहित, जिस शासन व्यवस्था के लिए हम संकल्पित हैं, उसका चिंतन रविदासजी की वाणी में हमें प्राप्त होता है। उन्हीं का कथन है कि-

ऐसा चाहूं राज मैं, मिले सबन को अन्न।

छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न।।

               अर्थात् मैं ऐसे शासन की स्थापना चाहता हूँ कि जिसमें प्रत्येक मनुष्य को अन्न उपलब्ध हो और जिसमें अमीर तथा गरीब बिना किसी भेदभाव के समान रूप से रह सकें। ऐसे राज्य की स्थापना ही मुझे खुशी प्रदान कर सकती है। 

               रविदासजी शिक्षा दार्शनिक भी थे। उनका शिक्षा का दर्शन बाबा साहब अंबेडकर के दर्शन से मेल खाता है। एक ओर रविदासजी ने विद्या के महत्व को स्थापित करते हुए कहा था कि-

सत विद्या को पढ़े, प्राप्त करें सदा ज्ञान।

रविदास कहे बिन विद्या, नर को जान अजान।।

               वहीं दूसरी ओर, उन्होंने साक्षर और शिक्षित में भी अंतर को रेखांकित किया था। बाबा साहब ने भी साक्षर और शिक्षित में अंतर किया है। रविदासजी कहते हैं कि केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, अपितु जो मनुष्य सही शिक्षा प्राप्त करने के बाद जन-कल्याण का प्रयत्न करता है, वही वास्तविक ज्ञानी है।

               रविदासजी ने जन्म के आधार पर होने वाले भेद-भावों की घोर उपेक्षा की। उन्होंने जातिवाद को केले के पेड़ का ऐसा तना बताया, जिसमें परतें तो अनेक हैं, लेकिन कोई ठोस पदार्थ नहीं है। इसी प्रकार मनुष्यों ने जातियों के भीतर अनेक जातियाँ बना दीं, जिसका कोई ठोस आधार नहीं है। जब तक यह जाति का भेद-भाव रहेगा, तब तक मनुष्य एक दूसरे से नहीं जुड़ पाएंगे। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि-

रविदास जन्म कै कारनै, होत न काउ नीच।

नर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम कौ कीच।।

               अर्थात् जन्म के आधार पर कोई मनुष्य ऊँचा या नीचा नहीं होता है, अपितु, मनुष्य का व्यवहार ही उसे ऊँचा या नीचा बनाता है। उन्होंने जाति व्यवस्था के समर्थकों को अपने अकाट्य तर्कों से चुप कराया और संपूर्ण समाज के लिए एक आदर्श प्रारूप प्रस्तुत किया, जिसे ‘बेगमपुरा‘ नाम दिया। उन्होंने बेगमपुरा की व्याख्या करते हुए कहा था कि यह बिना गम का शहर है, जहाँ कोई चिंता नहीं है, जो भूख, भय और अभाव से रहित है, जहाँ मनुष्यों का सदैव भला होता है, जहाँ सही विचारों की सरकार है, जहाँ कोई दूसरी या तीसरी श्रेणी का नहीं है और जहाँ किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं है।

               वे औपचारिक शिक्षा से रहित थे लेकिन विद्या, ज्ञान और भक्ति के मामले में वे ‘संत समाज सुमेरू‘ के समान थे। उनका निराकार ब्रह्म घट-घट वासी था और उनकी व्यापक दृष्टि सामाजिक सौहार्द की प्रतीक थी। उनकी समदर्शिता पर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं। उनके जैसे संत इस लोक के महानायक हैं, वे हमारी विरासत के पुरोधा हैं। उनके उपदेश सार्वदेशिक, सर्वकालिक और सार्वभौमिक हैं। ऐसे दिव्य महात्मा के श्री चरणों में कोटिषः नमन।

आपका 

शिवराज 

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